Munawwar rana Mushaira | Poetry(Kavita) | Shayari in hindi सिर्फ एक कागज पर लिखा शब्द मां रहने दिया | Ma Shayari

Munawwar Rana Poetry

उदास रहने को, अच्छा नहीं बताता है,

कोई भी जोहर को मीठा नहीं बताता है,

कल अपने आपको देखा था मां की आंखों में,

ए आइना हमें बुढा नहीं बताता है,

ए अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया,

मां ने आंखें खोल दी घर में उजाला हो गया,

इस तरह मेरे गुनाहों को, वो धो देती है,

मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है,

बुलंदियों का बड़ा से बड़ा निशान छुआ,

उठाया गोद में मां ने तब आसमान छुआ,

किसी को घर मिला हिस्से में या कोइ दुकाँ आई,

मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई,

बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है,

बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है,

बहुत जी चाहता है कह दे जाते हम निकल जाए,

तुम्हारी याद में, लेकिन इसी मलबे में रहती है

ए ऐसा कर्ज है, जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,

मैं जब तक घर ना लौटु मेरी मां सज़दे में रहती है,

मेरी ख्वाहिश है मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं,

मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं,

कम से कम बच्चों की होठों की हंसी के खातिर,

ऐसे मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं,

मुझको हर हाल में बक्सेगा उजाला अपना,

चांद रिश्ते में नहीं लगता है मामा अपना,

मैंने रोते हुए पूछे थे किसी दिन आंसू,

मुद्दतों मां ने नहीं धोया दुपट्टा अपना,

उम्र भर खाली यूं ही हमने मकान रहने दिया,

तुम गए तो दूसरे को कभी न यहां रहने दिया,

मैंने कल सब, चाहतों के सब किताबें फार दी,

सिर्फ एक कागज पर लिखा शब्द मां रहने दिया,

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