जिंदगी से मुलाकात
मेरी कबिताविओ में जब भी तेरा जिक्र आता है |
जी कलम को छोडिये पन्ना पन्ना इतराता है |
जिसे कोई सुन ना सका सन्नाटे की ओ आवाज हु मै |
मै तुझसे नाराज नहीं हो सकता इस बात से नाराज हु मै |
तुम चाहती हो की हम तुम्हे भूल जाये |
तुम जान हो मेरी अब क्या मर जाये |
आज फिर जिंदगी से मुलाकात हुई |
बैठ के संघ उसके यूही कई बात हुई |
ओ बोली की कुछ भी अनंत नहीं है यहाँ |
यहाँ है हर सुबह की रत हुई |
आज फिर जिंदगी से मुलाकात हुई |
बैठ के संघ उसके यूही कई बात हुई |
समझाया उसने दिल को की तू रोना बंद कर |
मेरे ये हसीन लान्हे तु खोना बंद कर |
रात हुई है तो जरुर उसकी सुबह होगी |
थोडा इंतजार कर कल और कोई तेरा महबूबा होगी |
अगर किसी और के साथ सुबह होना है तो कभी ना बीतेगा |
अब जिंदगी ने मुझे पास बैठाया |
मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे समझाया |
की इश्क गली ना चल इसमें बसी मौत है |
दिलो से खिलवाड़ करेने वाले इस जमाने में बहोत है |
फिर मैंने जिंदगी के कंधो पर हाथ रखी |
और उसे कुछ यु समझाया |
की अगर रास्ता ऐ मोहब्बत में नरमाई होती है |
की भगवान ने अपनी जोड़ी राधा संघ ना बनाई होती |
ना ही रांझे होते ना होते मजनू लैला |
हर कोई भटकता रहता बे इश्क अकेला |
अब उसने रस ए मोहब्बत बनाया ही है |
तो थोडा हम भी पी लेते है |
चल ना जिंदगी थोडा हम भी जी लेते है |
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