उसे दूर जाना ही अब मुनासिब लगता है |
क्योंकि वो मेंरी हर कमजोरी से वाकिफ लगता है |
और किस मुह से मिलाऊ उसे खानदान से भला |
मुझे तो यहाँ हर किसी का आशिक लगता है |
की उसकी फितरत से वाकिफ हो कर भी |
उसे अपनाया मैंने किसी अपने को खोकर भी |
और उसने मेरे साथ ही वही किया यारो |
ओ आज भी उन नकीबो से बात करता है मेरा हो कर भी |
की वो मुझसे झुठ बोलता जा रहा है |
ना जाने वो लड़का कहा जा रहा है |
और हर बार माफ कर देती थी मै उसे ए सोच कर |
की सायद ओ इस बार मेरी तरफ आ रहा है |
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