हर दरगाह में धागा बंधा मैंन, हर मंदिर में माथा टेका था,
मै इशवर अल्लाह सब भूल गया, जब उसको जाते देखा था,
सुख चुकी थी सब कलिया हर गली सुनसान थी,
कल तक थी मोहब्बत मेरी,
आज किसी और की बेगम जान थी,
इश्क से वाकिफ थी वो लेकिन, मजहब से अंजान थी,
बस गलती इतनी सी थी हमारी, मै हेन्दु वो मुशालमन थी,
बिलखता रहा मै रात भर, जब सारा जमाना सोया था,
अकेले अस्क नहीं थे मेरे आखों में, वो काजी भी उतना ही रोया था,
हर दर्द संभाल कर रखा मैंने, क्या बिगाड़ा था जमाने का,
किसी ने गम मनाया जुदाई का, किसी ने जसन मनाया उसके आने का,
मै उससे मोहब्बत करता था, वो मुझसे मोहब्बत करती थी,
मै पंडित जी का बेटा था, वो काजी साहब की बेटी थी,
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